सोमवार, अक्तूबर 22, 2012

लोगों को ‘संविधान’ सिखाएंगे श्याम बेनेगल

श्याम बेनेगल....एक कालजयी और सौम्यता में लिपटा एक विनम्र, बेहतरीन इंसान। सही मायनों में बेनेगल एक फिल्मकार नहीं दृष्टा हैं। फरवरी 2006 में मनोनीत सदस्य के तौर पर राज्यसभा की शपथ लेने के बाद, ज्यादातर सांसदों से उलट, बेनेगल उसे हूबहू निभाने में लग गए। संसद में अपनी मौजूदगी को लेकर किसी खांटी पार्लियामेंटेरियन से भी ज्यादा संजीदा.. हमेशा हाज़िर। हालांकि मैंने उन्हें सदन में सवाल पूछते या मुद्दा उठाते ज्यादा नहीं देखा..लेकिन फिर भी संसद की कार्यवाही के वक्त वो भीतर ही होते। शायद सांसदों की हर छोटी-बड़ी हरकत को किसी अदृश्य कैमरे में कैद करने के लिए। कोई 'निजी' सियासी दिलचस्पी ना होने के बावजूद संसद ठप होने पर उनके चेहरे पर वही अफसोस होता जो किसी अहम शूटिंग के वक्त आई बारिश के चलते 'पैकअप' कहने में भी नहीं होता होगा- 'एक और कीमती दिन बरबाद हो गया।' बेनेगल इस बार भारतीय संविधान पर एक कार्यक्रम लेकर छोटे पर्दे पर आ रहे हैं। यह जानकारी मेरी उनसे फोन पर हुयी बातचीत में मिल़ी...
1970 में शुरू हुए प्रयोगात्मक फिल्म आंदोलन के शुरूआती नारेबाज हैं श्याम बेनेगल। कला फिल्में कहलाने वाली उनकी फिल्में दरअसल कलात्मक फिल्में हैं जो आपके कंधे झंझोड़ कर अपनी मौजूदगी का अहसास करवाने में यकीन नहीं रखती। बल्कि एक अनुभवी उपदेशक की तरह अपना संदेश आपकी रगों तक पहुंचाती हैं, ताकि वो देर तक आपके जहन में पिघलता रहे। वैसे 'वेलकम टु सज्जनपुर' और 'वेल डन अब्बा' की शक्ल में बेनेगल ने हल्की-फुल्की फिल्में भी बनाईं, जिनके निर्माताओं ने बॉक्स आॅफिस पर मोटा माल भी बटोरा। बातचीत में बेनेगल ने बताया कि आगामी दिसंबर में वे भारतीय संविधान पर एक टेलीफिल्म लेकर आ रहे हैं, इसमें राजनीतिक ड्रामा है। दस एपिसोड यानि दस घंटे का यह पॉलिटिकल ड्रामा लोगों को संविधान के बारे में बताएगा। उनका मनोरंजन करने के साथ-साथ शिक्षित भी करेगा। बेनेगल कहते हैं,’हम लोगों को अपने कांस्टीट्यूशन को समझना चाहिए। वह क्या है, उसे जानना चाहिए। हमने इस टेलीफिल्म पर काफी मेहनत की है। दिसंबर तक यह तैयार हो जाएगा। अंबेडकर ने 1952 के चुनाव में अपनी पार्टी के घोषणापत्र में कृषि को प्राथमिकता दी थी। वह कृषि को औद्योगिक रूप देना चाहते थे ताकि समाज के निचले तबके का शोषण न हो और देश में समृद्धि भी आये।’
बेफिक्र, बेदर्द और बेअंदाज फिल्मी दुनिया में बेहद अनुशासित 40 साल बिता चुके श्याम बेनेगल को संसद में तथाकथित 'माननीयों' का वो बेढंग रवैया कैसे रास आता। उनके लिए तो संसद जाना जैसे एक कोर्स है, जिसके हर लम्हे का वो तसल्लीबख़्श इस्तेमाल चाहते हों। हमारे बेतकल्लुफ और बचकाने सवालों पर उन्होंने कभी नजरें नहीं तरेरीं। बेनेगल ने स्लमडाग मिलिनेयर के बारे में पहले ही घोषणा कर दी थी कि ये फिल्म '7 से 8 अवार्ड जीतेगी।' और जब टीवी पर खबर आयी -'आॅस्कर में स्लमडॉग मिलिनेयर की धूम, 8 अवार्ड जीते।' ये वो तजुर्बा है जिसके लिए दाढ़ी के सफेद बाल ही काफी नहीं होते.. उसके लिए श्याम बेनेगल बनना पड़ता है।
बेनेगल की तकरीबन हर फिल्म में काम कर चुके अमरीश पुरी ने अपनी आत्मकथा 'एक्ट आॅफ लाइफ' में लिखा है- 'श्याम एक चलता फिरता विश्वकोश हैं। वो इस धरती पर किसी भी विषय पर चर्चा कर सकते हैं। उनसे दुनिया के किसी भी हिस्से में सबसे बढ़िया और चुनिंदा रेस्टोरेंट के बारे में पूछ लो और वो आपके सामने फौरन एक फेहरिस्त रख देंगे, जहां उन्होंने खाना खाया हो.. हर विषय पर जानकारी रखना एक अद्भुत गुण है और श्याम ने हर बार इसे साबित किया है।' अमरीश पुरी साहब के दावे की निजी पड़ताल का दुस्साहस मैंने कभी नहीं किया, क्योंकि श्याम बेनेगल से बात करने भर से ही तबियत तृप्त हो जाती है। वैसे भी उनके साथ बने भुरभुरे रिश्ते को मैं अपने पेशेवर लालच से दूर रखना चाहता था लिहाजा 'कम पूछना- ज्यादा सुनना' का फलसफा ही निभाता रहा। अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर बेनेगल को मिली तारीफों और पुरस्कारों की फेहरिस्त इतनी लंबी है जितना किसी हिंदी फिल्म का क्रेडिट रोल भी नहीं होता। भारतीय सिनेमा का आॅस्कर यानी दादासाहेब फाल्के अवार्ड.. सात बार सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार.. पद्मश्री.. पद्म भूषण। बर्लिन, मॉस्को, कान्स जैसे प्रतिष्ठित सिनेमा समारोहों में उनकी फिल्मों का आना-जाना जैसे होता है, वैसे आपका और हमारा सिनेमा घरों में भी नहीं होता। 1000 से ज्यादा एडवरटाइजमेंट बना चुके श्याम बेनेगल ने सिनेमा को गुदड़ी के वो लाल दिए जिनके लिए ना सिर्फ हिंदुस्तानी बल्कि विश्व सिनेमा भी उनका कर्ज़दार रहेगा। नसीरुद्दीन शाह.. ओम पुरी.. अमरीश पुरी.. अनंत नाग.. शबाना आजमी.. स्मिता पाटिल.. और.. उनके पसंदीदा सिनेमेटोग्राफर गोविंद निहलानी। फ्रांसीसी फिल्मकार ज्यां ल्युक गोदार ने कहा था- 'सिनेमा जिंदगी को फिल्माने की कला नहीं है.. वो तो जिÞंदगी और कला के बीच का 'कुछ' है।' और.. श्याम बेनेगल ने तो अंकुर.. निशांत.. मंथन.. भूमिका.. जुनून.. आरोहन.. त्रिकाल.. सूरज का सातवां घोड़ा.. द मेकिंग आॅफ महात्मा.. सरदारी बेगम और जुबैदा इत्यादी की शक्ल में 'इतना कुछ' दिया है जिसे देख-देख कर आज भी सिनेमा के छात्र आॅस्कर जीतने का ख्वाब पुचकारते हैं। और... इतिहास के 'ऐतिहासिक' कायापलट की नायाब मिसाल- 'भारत एक खोज'.. उसे भला कोई कैसे भूल सकता है। अंत में फोन काटते-काटते मैंने पूछा..‘सर और अगली फिल्म कब तक? बोले-क्रिप्ट पर काम तो चल रहा है, लेकिन अभी वक्त तो इसी में चला जाएगा। बेनेगल साहब महान फिल्मकार गुरुदत्त के रिश्तेदार हैं। वे विद्या बालन के साथ एक स्पेनिश कहानी पर फिल्म बनाने की सोच रहे हैं। वो फिल्म जब भी बने, पर मुझे पक्का यकीन है कि पहले वो सियासतदानों की बखियां उधेड़ती अपनी एक नई फिल्म के साथ हाज़िर होंगे, जिसमें देश की उस सबसे बड़ी पंचायत के कई मुकदमों का कच्चा चिट्ठा होगा, जिसकी 'खोज' में उन्होंने 6 साल बिताए।